आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तेरी आस में!

                
                                                         
                            गीत
                                                                 
                            

जब उम्मीद का भाल झुकने लगे
तुम्हें अपना साया भी छलने लगे
तभी तुम मेरी सम्त मुड़ना ज़रा
वफ़ाओं का ख़ेमा गढ़ा ही मिलेगा
तेरी आस में!

नयी मंज़िलों की अभी चाह है
सुनहरी सी लगती हर इक राह है
अभी हौसलों के नए पंख हैं
दिशाओं में बजते विजय-शंख हैं
मगर जब ये परवाज़ थकने लगे
ये नभ का ग़ुरूर भी पिघलने लगे
तभी तुम मेरी सम्त मुड़ना ज़रा
वो बरगद का साया तना ही मिलेगा
तेरी आस में!

जब उम्मीद का भाल झुकने लगे
मरीचिका को तुमने समंदर कहा
बबूलों की छाँव को अपना घर कहा
कनक-मृग की ख़ातिर लुटाई है जान
कि दाँव पे रख दी है ख़ुद की पहचान
भ्रम का अँधेरा जो डसने लगे
स्वयं का ही अक्स जब हँसने लगे
तभी तुम मेरी सम्त मुड़ना ज़रा
प्रतीक्षा का आँगन सजा ही मिलेगा
तेरी आस में!
जब उम्मीद का भाल झुकने लगे
तुम्हें अपना साया भी छलने लगे
-भानु शर्मा रंज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर