आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सुरीले छंद बन जाओ

                
                                                         
                            गीत
                                                                 
                            

खिले जो फूल चाहत के
उन्हें मकरंद बन जाओ
हमारी मूक धड़कन के
सुरीले छंद बन जाओ

बिना तेरे दिशाओं ने
उदासी ओढ़ ली देखो
पवन ने पुष्प-कलियों से
निगाहें मोड़ ली देखो
सुलगती विरह की बेला
दहन होता रहा जीवन
झरे जो नेह-रिमझिम सा
वही आनंद बन जाओ

समय की काँच-सी नदियाँ
निरंतर बह रही देखो
प्रणय की मूक पीड़ा भी
हृदय में दह रही देखो
किनारे की प्रतीक्षा में
भटकती नाव है मन की
इसे जो पार ले जाए
अटूट अनुबंध बन जाओ


बिना बाती-शिखा के कब
दिए ने रोशनी दी है
तुम्हारे बिन लगे जैसे
उमर मैंने नहीं जी है
तरसते इन नयनों को
तुम्हारे दरस की आशा
अधूरी श्वास है मेरी
हृदय का स्पंद बन जाओ
-भानु शर्मा रंज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर