गीत
खिले जो फूल चाहत के
उन्हें मकरंद बन जाओ
हमारी मूक धड़कन के
सुरीले छंद बन जाओ
बिना तेरे दिशाओं ने
उदासी ओढ़ ली देखो
पवन ने पुष्प-कलियों से
निगाहें मोड़ ली देखो
सुलगती विरह की बेला
दहन होता रहा जीवन
झरे जो नेह-रिमझिम सा
वही आनंद बन जाओ
समय की काँच-सी नदियाँ
निरंतर बह रही देखो
प्रणय की मूक पीड़ा भी
हृदय में दह रही देखो
किनारे की प्रतीक्षा में
भटकती नाव है मन की
इसे जो पार ले जाए
अटूट अनुबंध बन जाओ
बिना बाती-शिखा के कब
दिए ने रोशनी दी है
तुम्हारे बिन लगे जैसे
उमर मैंने नहीं जी है
तरसते इन नयनों को
तुम्हारे दरस की आशा
अधूरी श्वास है मेरी
हृदय का स्पंद बन जाओ
-भानु शर्मा रंज
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