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सुप्त अभिलाषाएँ भी मचलने लगीं

                
                                                         
                            गीत
                                                                 
                            

तुम पधारे हृदय के घने कुंज में
हर दिशा से सुगन्धें छलकने लगीं
मौन आँखों ने जब मौन को पढ़ लिया
सुप्त अभिलाषाएँ भी मचलने लगीं

रेशमी स्पर्श पाकर हवा यों बही
नेह की कांप उठी सब हरी डालियाँ
मूर्च्छना से जगी चेतना की परत
बज उठीं प्राण के द्वार पर तालियाँ
लाज का आवरण जब सरकने लगा
धड़कनें ताल अपनी बदलने लगीं

दो सरित आज मिल कर समंदर हुईं
मिट गए बीच के सर्वथा फ़ासले
चाँदनी ने बुना मुग्ध सा एक भ्रम
रुक गए वक़्त के भागते क़ाफ़िले
प्रेम की आँच ने देह को जब छुआ
बर्फ़ की सर्दियाँ भी पिघलने लगीं

यह मिलन एक पावन अनुष्ठान था
बँध गए प्राण की रेशमी डोर से
गूँजता एक संगीत अंतस में था
चाँद तकता रहा आसमां-छोर से
श्वास में जब तुम्हारी छुअन घुल गई
साँस की वातियाँ यों महकने लगीं
-भानु शर्मा 'रंज'
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3 महीने पहले

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