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सुध-बुध मेरी तो सारी, वहीं खो गई,

                
                                                         
                            नैन साँवरे सलोने, जिधर उठ गए,
                                                                 
                            
सुध-बुध मेरी तो सारी, वहीं खो गई,
कान्हा तेरी मुरलिया ने, जादू किया,
राधा गोकुल की छोरी, मगन हो गई!

उड़ता गुलाल अंबर पे, जब छा गया,
रंग टेसू का गलियों में, भर सा गया,
श्याम ने मारी पिचकारी, ऐसी सखी,
चुनरी भान-दुलारी की, सतरंग गई!
सुध-बुध मेरी तो सारी, वहीं खो गई...

तीर यमुना के बंसी जो, बजने लगी,
रास मंडल में पायल भी, सजने लगी,
तान कान्हा ने छेड़ी जो, त्रिभंग की,
लहरें कालिंदी की भी, ठिठक सी गईं!
सुध-बुध मेरी तो सारी, वहीं खो गई..
.
काले बदरा घिरे सावन, आने लगा,
डाल कदंब पे झूला, सुहाने लगा,
संग राधा के झूलें हैं, नटखट हरी,
प्रीत ब्रज की तो सीधा, गगन छू गई!
सुध-बुध मेरी तो सारी, वहीं खो गई...
-भानु शर्मा रंज
 
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3 महीने पहले

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