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सोचकर यह मन विरह सहता चला

                
                                                         
                            गीत
                                                                 
                            

लौट आएगा कभी वह मीत फिर
सोचकर यह मन विरह सहता चला
तार जब टूटे हृदय की वीण के
अर्थ जब भटके नयन रस क्षीण के
काँपती जब उँगलियाँ भी थक गईं
प्रार्थना की पंक्तियाँ जब रुक गईं
याद को फिर बाँधकर पाथेय सा
सोचकर यह मन विरह सहता चला

लौट आएगा कभी वह मीत फिर
सोचकर यह मन विरह सहता चला
रश्मियाँ जब बन गईं तरकश से तीर
बाँटती जब हर दिशा बस प्राण पीर
आँधियों ने जब चुराईं मंज़िलें
राख ही जब बन गईं सब महफ़िलें
साँस के इस काँच को जोड़े हुए
सोचकर यह मन विरह सहता चला

लौट आएगा कभी वह मीत फिर
सोचकर यह मन विरह सहता चला
धड़कनों में गूँजती ज्यों भेरियाँ
श्वास पर ज्यों कस गईं हों बेड़ियाँ
आत्मा भी जब बदन से रुठ कर
चीख़ती थी वेदना में टूट कर
किन्तु स्मृतियों का दिया थामे हुए
सोचकर यह मन विरह सहता चला
लौट आएगा कभी वह मीत फिर
सोचकर यह मन विरह सहता चला

प्रेम में जो भी जला कुंदन हुआ
शूल भी उसके लिए चंदन हुआ
राख की परतों में छुपती ज्यों अगन
मौन में भी गूँजता हो ज्यों रुदन
इस अमर अहसास को जीवित लिए
सोचकर यह मन विरह सहता चला
लौट आएगा कभी वह मीत फिर
सोचकर यह मन विरह सहता चला
-भानु शर्मा रंज
 
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2 महीने पहले

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