चेतना के इस शिखर पर,
ध्यान के पावन प्रहर पर,
ईश की स्वर्णिम डगर पर,
सत्य के उन्मुक्त दर पर,
गा रहा हूँ आत्म-संगीत,
पा गया हूँ शाश्वत प्रीत।
अब छँटे हैं तिमिर के घन,
बन गई हैं वंदनाएँ।
मिल गया विश्राम मन को,
शांत हैं सब लालसाएँ।
खोजता था मैं जिसे कल,
वह मिला है आज प्रतिपल,
व्यर्थ थे सब तीर्थ दर्शन,
था अधूरा आत्म-मंथन।
आज खुल कर दृष्टि जागी,
हो गई है वीतरागी।
है नहीं कोई शिकायत,
धुल गई सब वेदनाएँ।
मिल गया विश्राम मन को,
शांत हैं सब लालसाएँ।
ग्रंथ पोथी और पन्ने,
जो गढ़े थे व्यर्थ मन ने,
योग का वह हठ भी छूटा,
दर्प का वह घट भी टूटा।
शून्य में अब गूंजता स्वर,
ब्रह्ममय है आज अंबर।
गूंजती हैं रोम में अब,
मौन की नव-घोषणाएँ।
मिल गया विश्राम मन को,
शांत हैं सब लालसाएँ।
यज्ञ की पावन शिखा-सा,
तप रहा था जो व्यथा-सा,
आज वह शीतल हुआ है,
जब मुझे उसने छुआ है।
'रंज' के सब द्वंद्व टूटे,
काल के अनुबंध छूटे।
मुक्ति के इस आचमन में,
घुल गईं सब यातनाएँ।
मिल गया विश्राम मन को,
शांत हैं सब लालसाएँ।
-भानु शर्मा रंज
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