तुम्हारी निगाहों ने जादू किया है
कि साँसों में ये गीत उतरने लगे हैं
छुआ जब से तुमने खयालों को मेरे
कई ख्वाब पलकों पे ठहरने लगे हैं
घटाओं ने बाँधी है पायल दिशा की
हवाओं ने छेड़ा है मल्हार मीठा
तुम्हारी छुअन का ये अमृत पिया तो
लगा ज़िंदगी का हर इक सार मीठा
मिली जब से नैनों को नैनों की मंज़िल
तो हम आईनों में निखरने लगे हैं
बसी है तुम्हारी छवी अंतर्मन में
कि जैसे हो राधा कन्हैया के मन में
नहीं अब कोई भी तमन्ना बची है
बंधे जब से प्राणों के पावन मिलन में
समर्पण का चंदन लगा भाल पर हम
इसी प्रेम पथ से गुज़रने लगे हैं
तुम्हारी हँसी से चुराकर के आभा
गगन ने सितारों का आँगन सजाया
तुम्हारे ही एहसास की गंध पाकर
कली ने लजा कर है घूँघट उठाया
तुम्हारे ही रंगों में ढलकर के अब हम
नई ज़िंदगी से सँवरने लगे हैं
भले कंटकों से भरा हो ये रस्ता
हृदय में तुम्हारे ही सपने पलेंगे
धरा क्या गगन भी अगर रूठ जाए
तुम्हारे ही साये में हम तो चलेंगे
यही सोचकर हम प्रणय के सफ़र में
हदों से भी आगे विचरने लगे हैं
-भानु शर्मा रंज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X