गहरी चोटें सहकर भी मन
पीड़ा की नदियाँ पीकर मन
एक लहर के ढल जाने से
सागर का जल कब घटता है
हार जीत तो काल खंड के
उजले पट पर बिखरे रंग हैं
काले उजले अक्स उभरते
ये तो बस नियति के ढंग हैं
परछाईं से त्रस्त हुआ मन
भ्रम के जालों में उलझा मन
कुछ चित्रों के धुंधलाने से
दर्पण का सच कब मिटता है
एक लहर के ढल जाने से
सागर का जल कब घटता है
अग्नि परीक्षा की वेदी पर
तप कर कुंदन रूप सजाता
पीड़ा की छैनी को सहकर
पत्थर मूरत में ढल जाता
तपन आग की देख डरे मन
अंगारों से क्यूँ घबराए मन
एक लपट के उठ जाने से
सोने का रंग कब उड़ता है
एक लहर के ढल जाने से
सागर का जल कब घटता है
नाश कहाँ है इस सृष्टि में
बस आकार बदल जाते हैं
बीज गड़े जब गहरी मिट्टी
तब ही तो पल्लव छाते हैं
माटी से जुड़कर भी जो मन
अम्बर तक उड़ने चाहे मन
एक पत्ती के झर जाने से
तरुवर का शीश कब झुकता है
एक लहर के ढल जाने से
सागर का जल कब घटता है
लाख बवंडर पथ में आएँ
या बिजलियाँ भी आ गिर जाएँ
जिसकी जड़ें ज़मीं से चिपकीं
वे वट वृक्ष नहीं मुरझाएँ
कठिनाई से टकराकर मन
और निखरता कुंदन सा मन
कुछ काँटों के बिछ जाने से
मंज़िल का मार्ग कब छुपता है
एक लहर के ढल जाने से
सागर का जल कब घटता है
-भानु शर्मा रंज
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