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रूठ जाए प्रीत

                
                                                         
                            गीत - रूठ जाये प्रीत
                                                                 
                            

जाना पर फागुन का रंग लेते आना मीत
दर्पन में छवि निहारते न रूठ जाए प्रीत

कैसे सहेजूँ इस चंदन-सी काया को
जब सुलग रही है धूप
कैसे मैं ओढूँ इस चूनर की छाया को
जब दहक रहा है रूप
कौन छुएगा इन काँपते अधरों को अब बोलो
जाना पर सावन की बूँद लेते आना मीत
सुधियों के दीप जलाते न रूठ जाए प्रीत

शांत न कर पाई मेरे मन की तृष्णा को
रिमझिम की यह बेला
लगे है सूना-सूना तेरे बिन ओ साजन
दुनिया का यह मेला
टूट न जाए मेरे आस की डोरी ये कच्ची
जाना पर कस्तूरी गंध लेते आना मीत
विरहा के गीत गुनगुनाते न रूठ जाए प्रीत

लहरों ने आ-आकर छुआ है किनारों को
नदिया में है हलचल
यौवन की देहरी पर खड़ी हूँ मैं एकाकी
थामे हुए यह आँचल
बह न जाए मेरे काजल की धार इन अश्कों में
जाना पर भोर की धूप लेते आना मीत
सपनों के महल सजाते न रूठ जाए प्रीत

रात घनी होने पर चुभने लगेगी मुझको
तारों की महफ़िल
मझधार में फँस कर खो न जाए कहीं
मेरा ये पागल दिल
जल्दी से आ जाओ तुम धड़कन पुकारे पिया
जाना पर होठों की प्यास लेते आना मीत
साँसों की लय को मिलाते न रूठ जाए प्रीत
-भानु शर्मा रंज

 
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3 महीने पहले

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