रंग अंबर का देखो मटमैला हुआ
गर्द का एक साया सा गहरा गया
मंजिलें खो गईं रास्ते मिट गए
रेगिस्तां में बवंडर नया छा गया
पांव के छाले अब दर्द देते नहीं
हौसलों के परिंदे भी उड़ते नहीं
प्यास से सूख कर होंठ पत्थर हुए
साथ चलता हुआ कारवां थर्रा गया
रेगिस्तां में बवंडर नया छा गया
एक सूखा शजर आस में था खड़ा
जैसे सदियों से वो प्यास में था गड़ा
लू के झोंकों ने ऐसा तमाचा जड़ा
बेसहारा सा वो पेड़ मुरझा गया
रेगिस्तां में बवंडर नया छा गया
झिलमिलाता हुआ नीर तो फरेब था
किस्मतों का लिखा यह अजब खेल था
रेत मुट्ठी से जैसे फिसलती गई
प्यास का वो भरम मन को भरमा गया
रेगिस्तां में बवंडर नया छा गया
अब तो कदमों के भी कुछ निशां ना बचे
चीख सुन ले यहां वो इन्सां ना बचे
धूल के ढेर में दफ्न सांसे हुईं
थक के हारे मुसाफिर को सुला गया
रेगिस्तां में बवंडर नया छा गया
-भानु शर्मा रंज
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