बज उठी बाँसुरी जब सखे स्याम की
राधिका की अगन सब चँदन हो गई
दरस ते पूर्व गोकुल की गलियाँ सभी
सूनी सूनी सी थीं ना उमंगें जगीं
क़दम की छाँव भी तब उदासी भरी
रास की गोपियाँ ना विरह में पगीं
तुम मिले तो छलकने लगीं गागरें
हर गली प्रेम जमुना मगन हो गई
अधर पे जब धरी तुम ने मुरली सखा
सुध बुध भूल कर सब दिशाएँ रुकीं
पवन थिर हो गई थिर हुए देवता
चाँद तारों की भी तब निगाहें झुकीं
तान ऐसी छिड़ी साँवरे की वहाँ
सगरी सृष्टि ही ज्यूँ सपन हो गई
मैं नहीं अब मेरी मैं तिहारी भई
श्याम रँग में मैं ऐसे रंगी साँवरे
दर्पण देखूँ तो मूरत तिहारी दिखे
रोम रोम में तुम ही बसे बावरे
मिट गया भेद राधा औ घनश्याम का
आत्मा ही परम ब्रह्म धन हो गई
-भानु शर्मा रंज
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