घिर रहा है श्याम सावन,
भीगता है विरह का वन,
पवन छूती प्राण-आँगन,
प्रीत का ये सजल भावन!
जग उठी है सुप्त सी आस,
पास है अब तेरा आभास,
देखकर ये मेघ व्याकुल,
मिट गईं मजबूरियाँ हैं!
आज अंबर गा रहा है,
प्रेम की अंगड़ाइयाँ हैं!
बूँद की बजती सितारें,
झूमतीं वन की बहारें,
नयन से नयन पखारें,
आज हम तुमको निहारें!
छिड़ गया मल्हार संगीत,
जीत ली है आज ये प्रीत,
इस कजरारी निशा में,
तय हुई सब दूरियाँ हैं!
आज अंबर गा रहा है,
प्रेम की अंगड़ाइयाँ हैं!
मृत्तिका की गंध मादक,
प्रेम है तप, प्रेम साधक,
मेघ-माला है अराधक,
आज कोई ना है बाधक!
मिल गए हैं दो किनारे,
छूट गए संसार सारे,
मौन के इस आचमन में,
खिल उठीं सब क्यारियाँ हैं!
आज अंबर गा रहा है,
प्रेम की अंगड़ाइयाँ हैं!
देह की लौ जल उठी है,
प्राण में हलचल उठी है,
प्यास ये निर्मल उठी है,
साधना प्रतिफल उठी है!
कर दिया सर्वस्व अर्पण,
तुम बने हो मेरा दर्पण,
उम्र भर के वास्ते अब,
जुड़ गईं सब कड़ियाँ हैं!
आज अंबर गा रहा है,
प्रेम की अंगड़ाइयाँ हैं!
-भानु शर्मा रंज
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