जब पड़ी कानों में तान श्री कृष्ण की
प्राण की राधिका बावरी हो गई
सुध बिसारी सभी आ गई कुंज में
साँझ की रंगत भी साँवरी हो गई
जोहती बाट थी नैन जल से भरे
पीर उर में बिरह की धधकती रही
हर दिशा बस पुकारे तुम्हीं को पिया
प्यास दरस की मन में खटकती रही
तुम मिले तो मिटी सब तपन प्राण की
हर व्यथा राधिका की मधुर हो गई
जब पड़ी कानों में तान श्री कृष्ण की
भूल कर देह का भान सुध-बुध सभी
प्रेम के इक समंदर में गोते लगे
थे जहाँ तक किनारे इस संसार के
वो सभी एक पल में ही छोटे लगे
तुमने देखा मुझे जब कृपादृष्टि से
प्रीत राधा-किशन की अमर हो गई
जब पड़ी कानों में तान श्री कृष्ण की
जल जमुना का भी आज उजला लगे
जब कदम की डरी झूमने सी लगी
मग्न होकर चली राधिका कुंज में
पवन भी केश उसके चूमने सी लगी
रंग ऐसा चढ़ा आज श्री कृष्ण का
आत्मा ही सखी अब अजर हो गई
जब पड़ी कानों में तान श्री कृष्ण की
-भानु शर्मा रंज
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