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पावन पुनीत हम प्रेम के स्पंदन हैं

                
                                                         
                            
सौंदर्य सृजन के गंधित वंदन हैं
हमने सँवारे रूप बहारों के
तुम देखो हम ही तेरे दर्पण हैं

वह अपनी ही तो प्यास रही होगी
जो होंठों पर बन आस रही होगी
जिस पुरवाई ने ज़ुल्फ़ उड़ाई है
वह अपनी ही उच्छ्वास रही होगी
उन गहरी आँखों की थाहें पाने को
उस रूप नगर में रूह बसाने को
पलकों को ज़्यादा क्या ही झुकाना है
हम तो पहले से पूर्ण समर्पण हैं

हम नैनों में वह अश्क पिरोते हैं
जो तेरी याद में अक्सर रोते हैं
वैसे तो हम दुनिया खातिर पत्थर
लेकिन तेरे आगे मोम से होते हैं
हम प्रेम नगर की ऐसी रीति सीखे
जिस ऋतु में देखें वसंत ही वसंत दीखे
दूजी मूरत को हमने न स्वीकारा
हम तेरी साँसों के ही चंदन हैं

हम राही अनबूझी चाहों वाले
दिल से दिल तक जाती राहों वाले
चेहरे की ये रौनक बता देगी
हम हैं कैसे पावन भावों वाले
अपना तो धागा जनम जनम का है
धड़कन पर पहरा तेरे ही कदम का है
तुम विरह रैन में बस दौड़े आना
सीमित नहीं हम अटूट बंधन हैं
-भानु शर्मा रंज
 
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3 महीने पहले

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