आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नयनों में घना अँधेरा है

                
                                                         
                            साँसों में उफनता सागर है
                                                                 
                            
तूफानों का जहाँ डेरा है
यह जीवन डोलती नौका सा
नयनों में घना अँधेरा है

तट पर है कांपती एक काया
छिन गई धूप घिर आई छाया
उम्मीद की डोर पिघलती है
सीने में अगन मचलती है
हर ओर से खौफ ने घेरा है

इस तट पर घना अँधेरा है
सूरज की स्वर्णिम किरणों को
काले मेघों ने लील लिया
दिन के इस उजले दामन को
रातों के तम से सील दिया
अब गुम सा हुआ सवेरा है
दिशाओं में घना अँधेरा है

जो फूल अभी बस महका था
निष्ठुर हवाओं ने तोड़ दिया
कच्चे धागों का वो सपना
मिट्टी के संग क्यों जोड़ दिया
यह टूटता हुआ बसेरा है
बगिया में घना अँधेरा है

मंझधार फँसी वह एक डिंगी
पर्वत सी लहरें उठती हैं
चप्पू टूटे पतवार गिरी
अब नाविक की सांसें घुटती हैं
यह काल का कैसा फेरा है
जल समाधि का घना अँधेरा है
-भानु शर्मा रंज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर