साँसों में उफनता सागर है
तूफानों का जहाँ डेरा है
यह जीवन डोलती नौका सा
नयनों में घना अँधेरा है
तट पर है कांपती एक काया
छिन गई धूप घिर आई छाया
उम्मीद की डोर पिघलती है
सीने में अगन मचलती है
हर ओर से खौफ ने घेरा है
इस तट पर घना अँधेरा है
सूरज की स्वर्णिम किरणों को
काले मेघों ने लील लिया
दिन के इस उजले दामन को
रातों के तम से सील दिया
अब गुम सा हुआ सवेरा है
दिशाओं में घना अँधेरा है
जो फूल अभी बस महका था
निष्ठुर हवाओं ने तोड़ दिया
कच्चे धागों का वो सपना
मिट्टी के संग क्यों जोड़ दिया
यह टूटता हुआ बसेरा है
बगिया में घना अँधेरा है
मंझधार फँसी वह एक डिंगी
पर्वत सी लहरें उठती हैं
चप्पू टूटे पतवार गिरी
अब नाविक की सांसें घुटती हैं
यह काल का कैसा फेरा है
जल समाधि का घना अँधेरा है
-भानु शर्मा रंज
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