गीत
सुना है कि अब दूरियां चुन रहे हो
मुझे आज खुद से जुदा कर रहे हो
अगर पास आना महज एक छल था
तो फिर स्वप्न इतने सलोने बुने क्यों
तपन ही लिखी थी अगर भाग्य में तो
घने मेघ सावन के तुमने चुने क्यों
हृदय में जगा कर के उम्मीद झूठी
बताओ ये कैसा दगा कर रहे हो
सुना है कि अब दूरियां चुन रहे हो
मुझे आज खुद से जुदा कर रहे हो
कहा था कि बंधन ये शाश्वत रहेगा
कहा था कि युग युग का नाता हमारा
मगर आज टूटे हैं सारे वो सपने
भंवर में ही छूटा है अपना किनारा
डुबो कर मेरी नाव इस धार में तुम
शुरू एक नई ही कथा कर रहे हो
सुना है कि अब दूरियां चुन रहे हो
मुझे आज खुद से जुदा कर रहे हो
हथेली से मेरी हथेली छुड़ा कर
तुम्हारी भी अंगुलियां कांपती हैं
दबा कर के होठों तले सिसकियों को
ये आंखें भी अपना क्षितिज मापती हैं
मुझे सौंप कर आंसुओं का समंदर
समर्पण को मेरे वृथा कर रहे हो
सुना है कि अब दूरियां चुन रहे हो
मुझे आज खुद से जुदा कर रहे हो
-भानु शर्मा रंज
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