गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको
कभी नींद में तुम अगर मुस्कुराए
मेरी ही खताएँ पुकारेंगी तुमको
भले भूल जाओ तुम सारे वो वादे
मेरी ही कसमें सताएंगी तुमको
गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको
नदी बन के जब भी समंदर से मिलो
मेरे खारेपन का तुम्हें बोध होगा
छिपाओगे आँसू जो बरसात में तुम
तुम्हारे ही अंदर नया शोध होगा
छुपाओगे महफ़िल में जो अश्क अपने
मेरी ही उदासी रुलायेंगी तुमको
गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको
तुम्हारे ही माथे का चन्दन हूँ मैं तो
मिटाकर भी खुशबू कहाँ खो सकोगे
हृदय में जो बोया है नेहों का अंकुर
उसे अश्क से तुम कहाँ धो सकोगे
तराशोगे पत्थर से जब कोई मूरत
मेरी ही निग़ाहें निहारेंगी तुमको
गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको
तुम्हारे ही रस्ते की मैं धूल बन कर
तुम्हारे ही कदमों से लिपटा रहूँगा
अमावस की रातों में बनके मैं दीपक
तुम्हारे उजालों से सिमटा रहूँगा
जहाँ रंज की ये विभूति जगेगी
मेरी युग-चेतना ही मनाएगी तुमको
गगन में जो पूरब की लाली खिलेगी
मेरी ही वफ़ाएँ पुकारेंगी तुमको
-भानु शर्मा रंज
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