भले ओढ़ लो तुम विस्मृति की चादर
मेरा नेह तुम पर छलकता रहेगा
बुझा दो भले दीप मेरी वफ़ा के
ये एहसास मन में दहकता रहेगा
नए फूल खिल तो सकेंगे चमन में
मगर गंध मेरी कहाँ से रचोगे
मैं रच-बस गया हूँ तुम्हारी रगों में
मुझे अपने तन से कहाँ तक तजोगे
जिधर भी उठेंगी तुम्हारी निगाहें
मेरा रूप बन कर महकता रहेगा
समय के तट पे जो अक्षर उकेरे
उन्हें मिटने की अब अनुमति न दोगे
अमिट है प्रेम इसका सत्य स्वीकारो
इसे तुम विस्मृति की थाती न दोगे
हृदय का स्पंदन जो तुमसे जुड़ा है
उसे तुम रिक्त कर अब और न दोगे
कभी शोर में जब बहुत घिर चुके हो
कोई मौन आकर बगल बैठ जाए
भले भीड़ में तुम स्वयं को छुपा लो
अकेलापन तुमको बहुत जब सताए
समझ लेना उस पल मेरी स्मृतियों का
हवन-कुंड मन में सुलगता रहेगा
कहा था कि जन्मों का बंधन है अपना
लहर के थपेड़ों से कैसे मिटेगा
मुझे मान लो तुम फ़क़त एक सपना
मगर नेह मेरा न तिल-भर घटेगा
भले तुम मुझे दूर कर दो स्वयं से
मेरे नाम से मन धड़कता रहेगा
चलो फिर से उस पार नदिया के जाएँ
जहाँ पत्थरों पर लिखे नाम अपने
लहर से कहें हम न इनको मिटाए
मुकम्मल करें हम अधूरे से सपने
घनेरे अँधेरे भले मार्ग रोकें
मेरा प्रेम-तारा चमकता रहेगा
-भानु शर्मा रंज
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