हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी
अपनो रँग रूप मिटाय दियो तब पीतम के कर राची हूँ
मैं मौन तपस्या सी तप कैं इस नेह नगर में नाची हूँ
बिरहा की तपन बुझावन कूँ मैं ओढ़ि चुकी बैराग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी
हथलेवा की इन रेखान पै मैं कुमकुम सो रँग घोर रही
जा जनम जनम के बंधन कूँ मैं प्रानन सों नित जोड़ रही
बिन बोले ही कह दीन्हीं है मेरे हियरे की आग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी
घिसि घिसि कैं नीर सनेहन में पिय की साँसन महकानी हूँ
मिटि कैं आपन पहिचान तिया मैं प्रेम कथा कहलानी हूँ
मोरे अँग अँग सों छलक रह्यो यह निश्छल नेह को त्याग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी
जो छूटि गई ई हाथन तें तो नैनन बिच बसि जाऊँगी
मैं रँग हिना को बनि करके पिय की धड़कन महकाऊँगी
मेरे रोम रोम में गूँजि उठ्यो एक अनहद मीठो राग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी
यौवन सूख्यो वा डाली पै पर मन में सावन छायो है
अस्तित्व विसर्जित करि अपना मैनें साँचो पीव रिझायो है
रंज भई अब दरस मगन जग गए जनम के भाग सखी
हरी हरी इन पातिन में छुपि बैठ्यो है अनुराग सखी
सिल बट्टे पै पिसि पिसि कैं मैं जागी बनत सुहाग सखी
-भानु शर्मा रंज
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