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मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ

                
                                                         
                            नयनों में सावन की नदियाँ साँसों में मरुथल की प्यास
                                                                 
                            
मिलन अधूरी एक कविता है विरह मुकम्मल सा अहसास
पूछ रहा है मन बंजारा किस ऋतु का सत्कार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ

जब तुम थे तो भोर गुलाबी रातों में थी चंदन गंध
कली कली में रस बहता था खुलते थे प्राणों के बंध
बादल से जब बूँद झरी तो सूखी माटी महक उठी
तेरी पायल की रुनझुन पर मेरी धड़कन चहक उठी
स्मृतियों के इन उजले पल का कैसे हाहाकार करूँ
पूछ रहा है मन बंजारा किस ऋतु का सत्कार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ

तुम बिछड़े तो सूनेपन ने ऐसा अपना जाल बुना
भीड़ भरी इस दुनिया में भी मैंने सन्नाटा ही चुना
अब तो चाँद जलाता मुझको सूरज देता सर्द हवा
इस दीवाने पागलपन की नहीं बनी है कोई दवा
सूनेपन के इस सागर को कैसे अब मैं पार करूँ
पूछ रहा है मन बंजारा किस ऋतु का सत्कार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ

तप भी देखा जप भी देखा देखा है वैराग्य कड़ा
किंतु प्रेम के इस मंदिर में विरह देवता सबसे बड़ा
बिना विरह के शृंगार का जग में कोई मोल नहीं
अश्रु न हों तो इस जीवन में नेह सुधा का झोल नहीं
इस द्वंद्व भरे अंतर्मन का बोलो क्या उपचार करूँ
पूछ रहा है मन बंजारा किस ऋतु का सत्कार करूँ

मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ
मैं शृंगार पे जीवन वारूँ या विरह से प्यार करूँ
-भानु शर्मा रंज
 
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3 महीने पहले

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