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मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है

                
                                                         
                            जिसके शोणित में ज्वाला ना, वह तो केवल खारा जल है
                                                                 
                            
कायरता की गोद पले जो, उसका यौवन एक छल है
खड्ग उठाये बिना शत्रु पर, वीर-प्रसूता बांझ लगेगी
रणभेरी की तान सुने बिन, कैसे सोई सिंहनी जगेगी
मृत्युंजय सा अमर तत्व यह, कोई सस्ता जाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

वज्र-देह जब टकराती है, दिशा-दिशा थर्राती होगी
रक्त-तिलक अपने भालों पर, विजय-श्री मुस्काती होगी
कटे शीश की रुण्ड-माल पर, जब रणचंडी अट्टहास करे
तभी देश का भाल गर्व से, ऊँचे गगन बीच वास करे
हँसते-हँसते फाँसी चढ़ना, कायर के बस का काम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

अस्थि-दान दधीचि करे जब, वज्र तभी निर्माण हुआ है
कटे शीश जब इस माटी पर, तब-तब नव-विहान हुआ है
छाती पर जो गोली खाए, वह तो सच्चा राष्ट्र-रतन है
माटी का कण-कण करता बस, उन वीरों का ही वंदन है
रण-भू पर मिटने वालों का, कभी भी मिटता नाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

जब तोपों के सिंहनाद से, दसों दिशाएं थर्राती हों
और शत्रु की मुंड-मालियाँ, जब रण-भू पर बिछ जाती हों
तब जाकर मिलता है गौरव, यही राष्ट्र की तो गरिमा है
रक्त-स्नात हो मातृ-भवानी, यह बलिदानों की महिमा है
बिना चुकाए मोल प्राण का, मिलता नव-आयाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

जब-तक लहू नहीं खौलेगा, तब-तक शमशीर न चमकेगी
अग्नि-परीक्षा दिए बिना ही, भारत-माँ कैसे धहकेगी
शीश कटा कर जो लड़ते हैं, इतिहास उन्हीं को गाता है
बलिदानों के चरणों में ही, यह अंबर शीश झुकाता है
मिट्टी का हर कण-कण बोले, कोई दूजा काम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

अंगारों पर पांव धरे जो, वही अमर बलिदानी है
रण-बांकुरों के शौर्यों की, जग भर में फैली कहानी है
भाले की नोक पे जीने का, अपना ही एक अंदाज़ है
शत्रु की छाती पर लिखता, हर वीर नया इतिहास है
शीश झुकाना इन वीरों को, वीरों का अपमान नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

आग उगलती तोपें देखें, सीने पर गोली खाकर
वीर बढ़े जाते हैं आगे, अपनी हर पीड़ा भुलाकर
तिरंगे की शान बचाने को, जो जान हथेली पर धारे
उन मतवालों के आगे तो, झुक जाते अंबर के तारे
इस माटी के कण-कण में तो, कोई दूजा दाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

मिट्टी की सौगंध यही है, शीश कटे पर झुकना ना
शत्रु के सम्मुख ऐ राही, पग पीछे को रखना ना
जब तक साँसों की डोरी है, तब तक रण-बांका रहना
आजादी की इस गाथा को, जग-भर में तुमको है कहना
इससे बढ़कर इस दुनिया में, कोई दूजा नाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।


टूट पड़े जो अंबर से भी, बिजली बन अरि-मस्तक पर
मृत्यु स्वयं भी थर-थर काँपे, जिसके भीषण दस्तक पर
जिसकी हुंकारें सुन कर के, कांपे शत्रु-कतारें सब
त्राहि-त्राहि कर उठती हैं जब, खड्गों की झंकारें सब
देश-धर्म से बढ़कर जीवन, कोई सुखद मुकाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

रक्त-रंजित माटी भालों पर, कुमकुम बन कर सजती है
तभी महाकाल के डमरू की, रण में डम-डम बजती है
शीश काटकर जो निज कर से, रणचंडी को भेंट करे
वही सपूत इस भारत-माँ के, सारे कष्ट समेट हरे
हँसते-हँसते सीना छलनी, करना कोई आम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

तोप-गोलों की बौछारों में, जो सीना ताने खड़ा रहे
तूफानों की आंधी में भी, जो पर्वत सा अड़ा रहे
जिसके लहू की एक बूँद से, पैदा सौ-सौ वीर हों
जिसके तीरों की मारों से, बिंधते दुश्मन के शरीर हों
रण-कौशल के इस तांडव में, कोई भी विश्राम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

टुकड़े-टुकड़े बदन हुआ पर, मुख से कभी उफ़ ना निकली
ऐसे ही वीरों के दम से, इस अंबर की छाती दहकी
अग्नि-कुण्ड में कूद पड़े जो, हँसते-हँसते प्राण लिए
इतिहासों के हर पन्ने ने, उनके ही गुणगान किए
मर कर भी जो अमर रहे, वो मिटता कभी भी नाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

लहर-लहर लहराए तिरंगा, जब तूफानी झोंकों में
वीर बढ़े जाते हैं आगे, मृत्यु के इन मौकों में
कोई भी ताकत दुनिया की, उनके पथ को रोक न पाए
सवा अरब की इस आबादी का, मस्तक ये झुकने न पाए
इस माटी का कर्ज चुकाना, कोई छोटा दाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।

जाग उठो ओ भारतवासी, अब तो निद्रा त्याग करो
मातृभूमि के लिए समर्पण, अपने सुख का त्याग करो
कण-कण में है आग भरी अब, हर पत्थर फौलाद बने
हम भारत के वीर सिपाही, दुनिया को यह याद रहे
बिना लड़े जो मिल जाए, वह स्वाभिमान का जाम नहीं है
मातृभूमि की वेदी से बढ़, दूजा तीरथ-धाम नहीं है।।


 
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2 महीने पहले

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