तुम्हारे खयालों का दरिया बहा तो
किनारों पे मीठी सी हलचल हुई है
तुम्हारी छुअन से मिली जो रवानी
ये सूखी सी मरुथल भी जलथल हुई है
घने जंगलों में जो भटकी हवाएँ
तुम्हारी महक पा के वो भी रुकी हैं
पहाड़ों की चोटी पे बैठी घटाएँ
तुम्हारे ही सजदे में आ कर झुकी हैं
तुम्हारे ही नैनों का काजल चुरा कर
ये शामें भी कितनी मुकम्मल हुई हैं
बर्फ की वादी में पुकारा तुम्हें जब
झील का हर कमल मुस्कुराने लगा है
तुम्हारी ही आहट को सुनकर के भँवरा
नए गीत कलियों को गाने लगा है
तुम्हारी ही यादों के साये में रहकर
मेरी हर उदासी भी ओझल हुई है
समंदर की लहरों ने गाथा लिखी है
क्षितिज पर तुम्हारे ही रंग छा गए हैं
तुम्हारी निगाहों के भँवर में फँसकर
किनारों के भी होश अब आ गए हैं
तुम्हारे ही प्रेम की पावन अगन से
ये पत्थर सी दुनिया भी कोमल हुई है
सितारों के मेले में ढूँढा तुम्हें जब
तो चाँद ने रश्क से मुँह फेर लिया है
तुम्हारी ही पायल की झंकार सुन कर
बादलों ने गगन को आ घेर लिया है
तुम्हारे ही वादों की डोरी से बंध कर
ये बेचैन धड़कन भी निश्चल हुई है
-भानु शर्मा रंज
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