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कैसे पार करूँ मैं प्रीतम विरह नदी की धार

                
                                                         
                            प्रेम बड़ा या पीर बड़ी है इस व्याकुल धड़कन की
                                                                 
                            
पूछ रही है आज व्यथा यह मेरे सूने मन की
उलझ गए हैं यादों में अब प्राणों के सब तार
कैसे पार करूँ मैं प्रीतम विरह नदी की धार

कोयल की कुहुकन में तेरी मीठी बात घुली है
जैसे भोर किरण ने आकर मलयज गंध मली है
पर्णकुटी में नेह के दीपक बुझने बुझने से हैं
ओस कणों में विरह के आंसू अब तो लिपटे से हैं
टूट चुकी है आस मिलन की रूठा है संसार
कैसे पार करूँ मैं प्रीतम विरह नदी की धार

अंतरिक्ष की नीरवता सा व्याकुल यह अंतर है
प्यासी है यह देह बावली प्राणों में पतझड़ है
मरुथल की तपती रेतों पर कोई बूँद न आती
स्मृतियों की यह लू हर पल है मुझको बस झुलसाती
मौन हो गई है अब धड़कन मौन हुआ झंकार
कैसे पार करूँ मैं प्रीतम विरह नदी की धार

हिमगिरि की बर्फीली चोटी सा मेरा मौन पिघलता
तेरे प्रेम भगीरथ को छू पावन नीर मचलता
तुम नयनों की सीपी में हो स्वाति की आस लिए
मैं भटकी हूँ मृग छौने सी तेरी ही बास लिए
हार गई हूँ मैं अपने मन से करके हाहाकार
कैसे पार करूँ मैं प्रीतम विरह नदी की धार
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3 महीने पहले

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