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कविता - जनता है

                
                                                         
                            कण-कण में व्यापे प्राण ये अंबर जनता है
                                                                 
                            
धरती के उर की पीर ये समंदर जनता है
जो मौन खड़ा तटबंध लहर की हलचल का
वो भीतर गहरा राज़ चराचर जनता है
नहीं शब्द की बैसाखी न कोई बनावटी दर्पण
यहाँ धूप की झोली में है छालों का अर्पण
बिना कहे जो बहता वो निर्झर जनता है
तरुवर की नंगी शाख पतझड़ का मंज़र जनता है
वो पगडंडी का धूल राही के पाँव का
कितना है कठिन सफ़र ये पत्थर जनता है
ये अंबर जनता है
क्षितिज की धुंधली रेखा जो पग-पग डोल रही
मिट्टी की सोंधी गंध जो गाथा बोल रही
नभ का नीला विस्तार थके पंछी का घर
थककर जो गिरा कपोत वो खण्डहर जनता है
तपते मरूथल की रेत जल की इक बूंद को
तृष्णा का तीखा दंश यहाँ हर थल जनता है
ये अंबर जनता है
बीज की बंद कोठरी में जो कल का जंगल है
काँटों की सख़्त हथेली में जो फूलों का मंगल है
अंधियारे की कोख से जो फूटी भोर नयी
उगते सूरज का ताप ये मंज़र जनता है
बादल के काले केश बिजली की तड़प को
सावन की पहली प्यास ये चातक जनता है
ये अंबर जनता है
शबनम की भीगी आँख कली की मुस्कान को
भँवरे की गुनगुन गूँज चमन की जान को
नदी का बाँका मोड़ समंदर की ओर दौड़
कितनी है गहरी प्रीति ये तटवर जनता है
झरने का स्वर गम्भीर पत्थरों की चोट पर
संगीत का मीठा दर्द ये गिरिवर जनता है
ये अंबर जनता है
पुरवाई की नन्हीं फूँक कलियों का जगना
रात की ओस का चुपचाप काँटों पे लगना
चाँदनी की रेशमी चादर सोये हुए पर्वत
कितनी है शीतल प्यास ये चंदा जनता है
जो शिला सोई सदियों से जल की धार के नीचे
घिसने का मीठा ताप वो पत्थर जनता है
ये अंबर जनता है
खेती की सूखी कोख हल की तीखी नोक को
धरती का धीरज सहता मेघों के झोंक को
पसीने की खारी बूंद जब माटी में मिलती
सोना उगाने का हुनर ये हलधर जनता है
अंकुर की नन्हीं ज़िद चट्टानों को चीरने की
प्राणों का अदम्य वेग ये तरुवर जनता है
ये अंबर जनता है
बाँसुरी के छेदों में कैद जो पवन की लय
साँसों के घर्षण से जो उपजी सुरमयी जय
काठ की बेजान देह जब राग को गाती
शून्य से सृजन का मिलन ये स्वरवर जनता है
अग्नि की लपटों में तपकर जो कुंदन निखरा
तपन की असली अग्नि वो जेवर जनता है
ये अंबर जनता है
पगडंडी के मुड़ते मोड़ राही की दुविधा
मंज़िल की धुंधली ओट राहों की असुविधा
नंगे पाँव जो नापे काँटों भरे रास्तों को
छालों का गहरा मौन वो सफर जनता है
सागर की उत्ताल लहर जब तट को चूमती
मिलन की व्याकुल तड़प ये जलधर जनता है
ये अंबर जनता है
सूखी नदी का रेत प्यासी हिरणी की पुकार
किनारे पे खड़ा वृक्ष पतझड़ का सत्कार
जो कली बिन खिले धूल में मिल गई
अनकहा वो सारा दर्द ये मंजर जनता है
जो लहर उठी थी सागर को लाँघने
मिटने का वो उल्लास ये तटवर जनता है
ये अंबर जनता है
कुम्हार के चाक पर जो मिट्टी की कराह
गढ़ने की उस चोट में छिपी जो एक चाह
कच्चे घड़े के भीतर जो शीतल स्वप्न है
तपने की वो मर्यादा ये अवट जनता है
मिट्टी से मूरत तक जो मौन यात्रा है
कारीगर की थकी उँगली वो हुनर जनता है
ये अंबर जनता है
दीपक की जलती लौ जो रात से लड़ रही
धुएँ की काली रेख जो नभ की ओर बढ़ रही
तिल-तिल जो जल चुका खुद को मिटाकर
अँधियारे की वो हार ये दीपांतर जनता है
तेल की हर एक बूंद जो स्वाहा हो गई
प्रकाश का वो संघर्ष ये प्रस्तर जनता है
ये अंबर जनता है
पक्षी के भीगी पंख तूफ़ानों की ज़द में
तिनकों का नन्हा घर जो बना हद-बेहद में
जो बवंडर को चीरकर नीड़ तक पहुँच गया
पंखों की वो थकान ये खगेश्वर जनता है
आकाश की ऊँचाई जो पंखों ने नाप ली
शून्य का वो विस्तार ये विहंगवर जनता है
ये अंबर जनता है
पहाड़ की ऊँची चोटी जो बादलों को थामती
झरनों की श्वेत धार जो पत्थरों को चूमती
बर्फ़ की जो परतें जमी हैं खामोश सी
भीतर की वो आँच ये हिमकर जनता है
जो पत्थर ठुकराया गया शिल्पकार से
मंदिर का वो आधार वो कंकर जनता है
ये अंबर जनता है
जो शून्य की कोख में महानाद का बीज है
जो प्रलय की ओट में नूतन की दहलीज़ है
मिटने से बनने तक जो साँसों का सेतु है
वो आदि और अंत ये विश्वंभर जनता है
जो बूंद गिरी नभ से सीप के हृदय में
मोती बनने का तप वो जलधर जनता है
ये अंबर जनता है
न शब्द की सीमा है न देह का ये घेरा
जहाँ द्वैत मिट गया वहीं हुआ है सवेरा
जो घट-घट में व्यापक अनाम सा सत्य है
वो अरूप अनूप छवि ये परात्पर जनता है
मृग की कस्तूरी जो रची बसी है भीतर
भटकाव का वो अंत ये दिगंबर जनता है
ये अंबर जनता है
तजकर सब छद्म वेष जब रंज तू मौन हुआ
तब जागा वो बोध कि मैं कौन और तू कौन हुआ
न कोई यहाँ ज्ञाता न कोई यहाँ ज्ञेय है
स्वयं में ही स्वयं को ये स्वयंवर जनता है
जो आत्मा का सूरज कभी न अस्त होता
वो अखंड ज्योति पुंज ये अभ्यंतर जनता है
कण-कण में व्यापे प्राण ये अंबर जनता है
धरती के उर की पीर ये समंदर जनता है
जो मौन खड़ा तटबंध लहर की हलचल का
वो भीतर गहरा राज़ मेरा ईश्वर जनता है
-भानु शर्मा रंज
 
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3 महीने पहले

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