गीत
कभी मौन में जब सुनोगे हृदय को
तुम्हें याद आएँगे वादे सहारे
नदी चाहे जितनी दिशाएँ बदल ले
मिलन को तरसते हैं दोनों किनारे
कभी मौन में जब सुनोगे हृदय को
गगन के पटल पर सजेगी जो संध्या
तो स्मृति में जल उठेंगे दीप्त तारे
भले दूरियों के पहर लाख बीतें
मगर प्राण तुमको ही हर पल पुकारे
कभी मौन में जब सुनोगे हृदय को
भले ही अधर पर सजा लो तराने
छुपा कर नयन में जो हैं अश्क खारे
दिखावे की दुनिया से जिस दिन भी हारो
खुले ही मिलेंगे तुम्हें मन के द्वारे
कभी मौन में जब सुनोगे हृदय को
ये साँसों का गणित नहीं है प्रणय बस
तपस्या है युग की कई रूप धारे
तुम्हारी ही मूरत हृदय के शिवाले
मेरी वंदना नित्य तुमको सँवारे
कभी मौन में जब सुनोगे हृदय को
चलो छोड़ दें आज लहरों की ज़िद को
भँवर के ही सीने से कश्ती उबारे
समय के शिलालेख पर नाम लिख दें
जिसे काल का चक्र भी बस निहारे
कभी मौन में जब सुनोगे हृदय को
-भानु शर्मा रंज
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