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जुदाई की चादर नई ओढ़ ली है

                
                                                         
                            गीत
                                                                 
                            

सुहाने सफर की निशानी मिटा कर
जुदाई की चादर नई ओढ़ ली है
घने दर्द के बादलों में गिरा कर
किनारे से अपनी डगर मोड़ ली है
सुहाने सफर की निशानी मिटा कर
जुदाई की चादर नई ओढ़ ली है

हृदय के बहुत जो करीब आ गए थे
अचानक वो रिश्ते पराए हुए हैं
तुम्हारी हँसी में सवेरे जगे थे
वो साए भी अब तो चुराए हुए हैं
जला कर मुहब्बत की अपनी विभूति
भरोसे की वो नींव क्यों तोड़ दी है
सुहाने सफर की निशानी मिटा कर
जुदाई की चादर नई ओढ़ ली है

सुना था कि होता है सच्चा वही प्रेम
मुकम्मल कभी जो नहीं हो सका है
मगर क्या ज़रूरी था साबित ये करना
हमारा मुकद्दर भी अब रो चुका है
अधूरी कहानी बनाने की खातिर
विरह से नई श्रृंखला जोड़ ली है
सुहाने सफर की निशानी मिटा कर
जुदाई की चादर नई ओढ़ ली है

गए तुम पलट कर बिना कुछ भी बोले
ठिठक कर खड़ा मैं उसी रास्ते पर
गुज़रती है कैसे बिना तेरे रातें
ठहर सा गया रंज उस हादसे पर
मुझे शून्य के मौन में यूँ गिरा कर
विरह की नई इक व्यथा छोड़ दी है
सुहाने सफर की निशानी मिटा कर
जुदाई की चादर नई ओढ़ ली है
-भानु शर्मा रंज
 
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2 महीने पहले

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