गीत
माटी में मिल जाने पर ही,
बीज वक्ष को चीर उठेगा।
अंधियारों से लड़ने वाला,
किरणों का उर-तीर उठेगा।
बिन विपदा के चक्रव्यूह में,
कौशल कहाँ निखरता है जी।
चोट सहे बिन पाषाणों में,
देव कहाँ उभरता है जी।
वज्र हृदय करना पड़ता है,
जब-जब शूलों का मेला है।
अग्नि-परीक्षा हर युग में ही,
सच्चाई ने तो झेला है।
बिना जले बाती को बोलो,
तम पे कब अधिकार मिलेगा?
पीड़ा की भट्टी में तपकर,
जीवन को आकार मिलेगा।।
विष का प्याला पिये बिना क्या,
कोई नीलकंठ कहलाया?
सूली पर चढ़ने वालों ने,
अमरत्व का है पद पाया।
जिसने भी निज मोह त्याग कर,
कुरुक्षेत्र का समर चुना है।
कालखंड ने उसी वीर को,
अपने पन्नों में ही बुना है।
कंटक का पथ चुना जिन्होंने,
सुख की सेजें त्याग दीं सारी।
उनके ही चरणों का वंदन,
करती आई सृष्टि हमारी।
लहरों से टकराने पर ही,
कश्ती को पतवार मिलेगा।
पीड़ा की भट्टी में तपकर,
जीवन को आकार मिलेगा।।
नियति खेलती उसी संग जो,
मज़बूती से डट जाता है।
गहन अमावस में भी जुगनू,
निज प्रकाश से मुस्काता है।
कोई साथ नहीं देगा जब,
ख़ुद ही सारथी बनना होगा।
टूटें तीर, धनुष भी टूटें,
फिर भी रण में तनना होगा।
आँसू को हथियार बना कर,
अपनी पीड़ा ख़ुद पीनी है।
साँसों की लय टूट न जाए,
यूँ ही ज़िंदगी यह जीनी है।
आत्म-सत्य के इस समर में,
तभी नया विस्तार मिलेगा।
पीड़ा की भट्टी में तपकर,
जीवन को आकार मिलेगा।।
-भानु शर्मा रंज
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