देह से दूरी मन से निकटता कैसी यह अनुराग कथा
मौन होंठ हैं सजल नयन हैं किसे सुनाऊँ मर्म व्यथा
तुम चंदन की गंध सी लिपटी मैं वन का एकांत प्रिये
इस विरह की पावन अग्नि में जलता है वृत्तांत प्रिये
मुझे याद है प्रथम मिलन की वह सिंदूरी साँझ सुहानी
तुम्हारी आँखों में ठहरी थी सदियों की अद्वैत कहानी
केश तुम्हारे श्याम घटाएँ मुखड़ा पूनम का आकाश
मेरे तपते हुए मरुस्थल में तुम सावन का मधुमास
तुम्हारे स्पर्श से जाग उठी थी हर साँसों में झंकार नयी
तुम बिन अब बेजान पड़ी है मेरे मन की वीणा वही
टूट गए सब तार मिलन के मन है बहुत अशांत प्रिये
इस विरह की पावन अग्नि में जलता है वृत्तांत प्रिये
अब तो बस यह सूनापन है और तुम्हारी यादों की लौ
मेरे भीतर एक समंदर जिसमें उठती दर्द की रौ
अमलतास के पीले पत्ते मेरी पीड़ा गाते हैं
सांझ ढले जो लौटें पंछी मुझको बहुत रुलाते हैं
मैं पत्थर सा मौन खड़ा हूँ सहकर युग का आघात प्रिये
इस विरह की पावन अग्नि में जलता है वृत्तांत प्रिये
दुनिया समझे मिलन ही केवल प्रेम का है अंतिम छोर
किसे बताऊँ विरह में मैंने पाई है नव रश्मि भोर
श्रृंगार तो बस एक आकर्षण विरह आत्मा का गहना
प्रेम इसी का नाम है शायद हँस कर हर पीड़ा सहना
कालचक्र के इस भंवर में सत्य यही अमलान कथा
मौन होंठ हैं सजल नयन हैं किसे सुनाऊँ मर्म व्यथा
देह भले हो दूर हमारी मन है जुड़ा नितांत प्रिये
इस विरह की पावन अग्नि में जलता है वृत्तांत प्रिये
-भानु शर्मा रंज
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