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हर जगह एक नया सा नज़ारा मिले।

                
                                                         
                            रोज़ नई-नई ये हवाएँ चलें,
                                                                 
                            
हर जगह एक नया सा नज़ारा मिले।
गाँव पीछे छुटे, वादियाँ आ गईं,
ज़िंदगी को नया एक किनारा मिले!

सब्ज़ पेड़ों पे जब धूप पड़ने लगी,
शांत नदियों ने लहरों को गाना दिया।
आसमानों को छूने लगीं चोटियाँ,
बर्फ ने वादियों को ठिकाना दिया।
लौट कर फिर न जाएँ पुरानी गली,
हर सफ़र में नया एक सितारा मिले!
रोज़ नई-नई ये हवाएँ चलें,
हर जगह एक नया सा नज़ारा मिले।

रेत पर ज्यों उभरती हुई आकृतियाँ,
रोज़ बनती, बिगड़ती, सँवरती रहीं।
लहरें उठ कर चट्टानों से टकरा गईं,
सीपियाँ रेत पर ही बिखरती रहीं।
भूल कर कल की बातें बढ़ें सामने,
वक्त का एक नया सा इशारा मिले!
रोज़ नई-नई ये हवाएँ चलें,
हर जगह एक नया सा नज़ारा मिले।

पर्वतों के सन्नाटे में है गूँज जो,
भीड़ के शोर में वो मिलेगी कहाँ।
एक ही रंग देखेगा कब तक नयन,
रोज़ चोला बदलता है ये आसमाँ।
कैद से छूट कर आज पंछी उड़े,
हौसलों को हवा का सहारा मिले!
रोज़ नई-नई ये हवाएँ चलें,
हर जगह एक नया सा नज़ारा मिले!
-भानु शर्मा रंज
 
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3 महीने पहले

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