रूप की निधान बाला, षोडश शृंगार साजे
रति काटे उंगरी को, देख छबि भाल की
कामदेव अस्त्र डारे, नैनन के बान आगे
भौंह की कमान तने, चाल है मराल की
कुंद कली दंत सोहे, अधर प्रवाल जैसे
मंद मुसकान देख, सुधि नहिं काल की
यौवन तरंग उठे, अंग अंग आभा जगे
चंद्रमुखी देख फीकी, दीप्ति सुर बाल की
नागिन से काले केश, लटें जब लहराएं
सुध बुध खोए देव, छबि रस धार सी
कटि है केहरी जैसी, लचक बदन माहीं
पायल की रुनझुन, बजत सितार सी
सौलह सावन बीते, मादकता अंग में है
मदिर सुगंध उड़े, नवल बहार सी
कामदेव शीश नावे, देखत ही हुस्न आज
ब्रह्मा ने गढ़ी है कृति, स्वर्ग अवतार सी
रूप की अनूप सुधा, छलके कपोलन से
नैनन की कोर देख, खंजन लजाता है
भाल पर लाल बिंदी, भोर की अरुन प्रभा
देख के विलास रति, शीश झुक जाता है
अधर गुलाब दल, हास्य में बसंत खिले
काम भी कटाक्ष देख, पीर मीठी पाता है
अंग अंग दामिनी सी, दीपति बिखेर रही
रूप का अथाह सिंधु, ज्वार ले के आता है
चाल में तरंग जैसे, मलयज वायु चले
पायल की रुनझुन, मधु रस घोलती
घूंघट की ओट से जो, लाज से झुकाए नैन
प्रेम की पहेली मूक, नैनन से बोलती
कटि की लचक देख, नागिन भी खाए मात
ताल दे अनंग स्वयं, हंसिनी सी डोलती
जैसे शिल्पकार कोई, स्वर्णिम महल गढ़े
रूप की शिखा सी सज, प्रेम द्वार खोलती
कंचन सी देह सजे, चंपई सुगन्ध उड़े
देख छबि देवों का भी, टूटता गुमान है
चितवन तीखी ऐसी, बेधती है पार उर
काम के निषंग नहिं, ऐसे तीखे बान हैं
अधर पके हैं बिम्ब, मोती सी दशन पाँति
मुसकान देख योगी, बिसरता ध्यान है
नवल किशोर वय, रोम रोम दीप्ति जगे
सृष्टिकर्ता की कला का, सजीव प्रमान है
सावन के मेघ जैसे, बिखरी है केश राशि
उँगरी चबात रति, मन में मलाल है
मदमाती भई देह, अंग अंग रस भीगे
रूप की अगन उठे, अद्भुत कमाल है
मदिरा पीकर जैसे, मतवाली चाल चले
पायल के घुंघरू ही, करते बेहाल हैं
हारकर मन्मथ भी, बाण छोड़ दूर खड़ा
स्वर्ग की अप्सराएँ भी, पूछती सवाल हैं
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