माया के इस घने तिमिर में,
सत्य-सुधा छलकाने से पहले,
प्राणों के निर्जन स्पंदन में,
चेतना का इक दीप जलाओ तुम।
ग्रह-नक्षत्रों के मौन नाद से,
अंतर का अनुराग मिलाओ तुम,
मृगतृष्णा को सत्य मानकर,
मत अपने विश्वास गिराओ तुम।
प्रकृति निरन्तर है वन्दन में,
जब एकांत का चित्र उकेरो,
तो श्वासों की तूलिका लेकर,
भक्ति का कोई रंग सजाओ तुम।
मस्तिष्क के संशय को तजकर,
आत्मा को कुछ तो समझाओ तुम,
तर्कशास्त्र के जड़ सूत्रों पर,
श्रद्धा के कुछ फूल चढ़ाओ तुम।
हठधर्मी इस काल-चक्र में,
फिर नश्वरता की पृष्ठभूमि में,
शाश्वत जीवन की प्रत्याशा का,
पुण्य-प्रतीक हृदय में बसाओ तुम।
महाकाल ने सौंपी हैं जो,
बाधाएँ, उन पर मुस्कराओ तुम,
ब्रह्मांडों के भाल-पटल पर,
मौन प्रार्थना को पहुँचाओ तुम।
रीती प्यास लिये मुट्ठी में,
औंधे पड़े मनोरथ के घर,
बिना अर्थ की इस तृष्णा पर,
करुणा का इक मेघ झुकाओ तुम।
भौतिकता के कोलाहल में
मोह-पाश से स्वयं को बचाओ तुम
कर्म-यज्ञ की इस वेदी पर
अहंकार की समिधा जलाओ तुम
दिशाहीन इस अन्धकार में
परम-ज्योति का ध्यान धरो जब
अनुभूति के अक्षर गढ़कर
मुक्ति का पावन गीत सुनाओ तुम
-भानु शर्मा रंज
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