पुलवामा कांड में वीर शहीदों को समर्पित कविता
भाल के सिंदूर हे धधकी हुई रण-ज्वाल तुम
हिम-शिखरों पे जमे हुए साक्षात् महाकाल तुम
धमनियों में खौलता अंगार है जिनमें भरा
जिनके चरण की थाप से है कांपती अम्बर-धरा
तुम अचल तुम अडिग तुम ही वज्र के अवतार हो
तुम शत्रु की छाती पे खिंची प्रलयंकारी धार हो
कड़कती हुई बिजलियों को मुट्ठियों में भींचकर
तुम खड़े हो राष्ट्र की हर एक सीमा सींचकर
पर बर्फ की सफ़ेद चादर जब लहू से लाल हो
पूछो उसी से त्याग का क्या मोल इस भाल हो
जब पत्र कोई नाम का चौखट पे आकर कांपता
बूढ़ी डगर की दृष्टि का सूनापन अम्बर नापता
जिस माँग का सिन्दूर पोंछा राष्ट्र की इस वेदी पर
रोई होंगी देवियाँ भी उस शहादत को देखकर
उन अनाथ सिसकियों में जो अनकहा हाहाकार है
पर आँसुओं की बूँद में जो मातृभूमि का प्यार है
वही तो इस वतन का सबसे बड़ा श्रृंगार है
वही तो माँ भारती का सबसे बड़ा श्रृंगार है
पर खेद है इस आँगन में पल रहे कुछ सांप हैं
जिनकी हँसी में गूँजते विधवाओं के विलाप हैं
वे आस्तीन के तक्षक जो बिछाते नीच शूल हैं
वे भूल बैठे रक्त से ही सिंचते ये मूल हैं
ओ राष्ट्र के जयचंदों सुन लो हुंकार प्रलय की
यह आग बुझने की नहीं जब तक न हो बेला जय की
तुम गरल बोते रहो वो प्राचीर बन कर अड़ेंगे
तुम पीठ पीछे वार कर वो छातियों पे ही लड़ेंगे
तुम्हारे हर षड्यंत्र का वे शीश भी काटेंगे यूँ
जैसे गरुड़ ने नाग को नोचा हो अपने नख से ज्यूँ
सौगंध है उस दूध की जो माँ ने तुमको है पिलाया
सौगंध उस माटी की जिसपे शीश तुमने है चढ़ाया
जब तक हिमालय का मुकुट यह भाल पर उन्नत रहेगा
हर एक कतरा रक्त का बस एक ही स्वर में कहेगा
हे मृत्यु तू भी आज रण में शीश अपना नत कर
ये वीर जो सोये यहाँ हैं राष्ट्र की अमूल्य धरोहर
कोटि-कोटि है नमन उनको जो स्वयं ही जल गए
रखने को रौशन देश ये जो सूर्य बन कर ढल गए
कोटि-कोटि है नमन उनको जो स्वयं ही जल गए
रखने को रौशन देश ये जो सूर्य बन कर ढल गए
-भानु शर्मा रंज
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