रसिक भंवर मन लोभित डोलै
चाहत रूप सुधा की क्यारी
ऐसी प्यास जगाय दई हिय
भई बावरी सुध बुध हारी
ऐसो दरद दियो हे साजन
बनि गई तेरी प्रेम पुजारी
इतने नीर बहें इन नैनन
मारग की सब धूरि बहाऊँ
इतनी रंक करै मोहे प्रीतम
तोरे दर पे जनम बिताऊँ
ऐसी अगन उठै हियरे में
जरे विरह में देह बेचारी
इतनी सुध बुध हरो कि जियरा
दरस परस को रहै भिखारी
ऐसो दरद दियो हे साजन
बनि गई तेरी प्रेम पुजारी
घटै न जौ विरह की रतियां
जरि जरि प्रान करैं उजियारो
पहिली सेज सजे चिहुँ दिसि में
जहाँ मिलै मोहिं पीव हमारो
पहिले मोर सिंगार सजे जब
प्रीत पुकारै बाँह पसारी
पहिले मोर सुहाग उठै जब
हियरा तजि दे देह संसारी
ऐसो दरद दियो हे साजन
बनि गई तेरी प्रेम पुजारी
कुम्हलावन न पावै जोबन
ऐसी पीर रची इस तन की
कबहुँ न बुझि पावै आसा
ऐसी लगन लगी इस मन की
सूखी रहै न सेज नेह की
पिया मिलन की रितु सुखकारी
बूँद गिरै अरु सावन आवै
हरियावै मन की फुलवारी
ऐसो दरद दियो हे साजन
बनि गई तेरी प्रेम पुजारी
पड़ें चरन जहँ जहँ मोरे पी
खिलन लागैं नेह चमेली
बाजे जहाँ घुँघरू मोरा
गूँज उठै रस तान अलबेली
हँसि दे मोरी प्रीत जहाँ पै
छबि पर वारूँ दुनिया सारी
कंकर हर मूरति बन जावै
वृन्दावन हर कुंज पियारी
ऐसो दरद दियो हे साजन
बनि गई तेरी प्रेम पुजारी
उनको रूप बनै मोरा दरपन
जो डगमग हैं नेह डगर में
हियरो बनै चँवर सिंघासन
पीय पधारें मोरे नगर में
चरन कमल की धूरि माथे की
बनि जावै कस्तूरी कारी
काव्य बनै वह मिलन कथा जो
जुग जुग तक गावै नर नारी
ऐसो दरद दियो हे साजन
बनि गई तेरी प्रेम पुजारी
मोहे स्राप लगि जावै निहारूँ
जौ आन पुरुष की परछाईं
अँखियाँ फूटि जायं बिना पी
देखूँ जौ सावन तरुनाईं
टूटैं मोरी साँस ताहि छिन
जौ बिसराऊँ मूरति धारी
मोरा जीबन पाप है सजनी
जौ प्रीतम बिन रैन गुजारी
ऐसो दरद दियो हे साजन
बनि गई तेरी प्रेम पुजारी
-भानु शर्मा रंज
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