आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एकाकी ध्यान प्रिये

                
                                                         
                            नील गगन की शांत गुफा में तुम एकाकी ध्यान प्रिये
                                                                 
                            
तप्त मरुस्थल की छाती पर मैं दर्द का आख्यान प्रिये
आँसुओं की खारी स्याही से वक्त ने जो खत लिक्खा है
मैं उसी भीगे से कागज़ की आखिरी पहचान प्रिये

तुम किसी मंदिर की घंटी का एक मधुर निनाद सुनो
मैं किसी खंडहर में गूँजा शून्यता का नाद सुनो
तुम असीमित सूनेपन के भाल का सिंदूर अगर
मैं धरा की कोख से जन्मा एक नया अरमान प्रिये
नील गगन की शांत गुफा में तुम एकाकी ध्यान प्रिये

प्राण के इस सूने से मंच पर साथ जो तेरा है मिला
सूखे हुए से इस उपवन में पारिजात का फूल खिला
तुम समंदर के हृदय की अचल शांत मुस्कान अगर
मैं लहरों की छातियों पर मचला हुआ तूफ़ान प्रिये
नील गगन की शांत गुफा में तुम एकाकी ध्यान प्रिये

भेद अपना और पराया आज यहाँ सब मिटने लगे
साँसों के इस बहते जल में फासले सब घटने लगे
तुम अमर शिव की ही तरह वैराग्य का प्रतिमान अगर
मैं तुम्हारे पाँव पे रखा हँसता सा बलिदान प्रिये
नील गगन की शांत गुफा में तुम एकाकी ध्यान प्रिये
-भानु शर्मा रंज
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर