गीत
उजाले सभी आज धूमिल हुए हैं
अमावस के साए मुकम्मल हुए हैं
हथेली से रेखा मिटा कर के मेरी
मेरे भाग्य को तुम निरक्षर कर चले हो
हृदय के नगर आज खंडहर हुए हैं
अकेला मुझे किस डगर कर चले हो
शिशिर की हवा सा तुम्हारा ये जाना
बसंतों का जैसे हुआ हो फसाना
झुकी डालियों पर जो बैठे विहग थे
उड़ा कर उन्हें तुम बेघर कर चले हो
बसी थी जो सांसों में चंदन सी खुशबू
उसे आज ऐसे गरल कर चले हो
हृदय के नगर आज खंडहर हुए हैं
अकेला मुझे किस डगर कर चले हो
कथाएं जगत की हमेशा से छल हैं
अधूरे प्रणय के ये कड़वे गरल हैं
सुना है जगत में अधूरा ही अमर है
तो फिर प्रेम करना ही सबसे ज़हर है
मगर प्रेम तो आत्मा का भजन था
उसे देह का आवरण कर चले हो
हृदय के नगर आज खंडहर हुए हैं
अकेला मुझे किस डगर कर चले हो
उठे हैं कदम पर नज़र है रुकी सी
तुम्हारी भी पलकें हैं कुछ आज झुकी सी
अगर यूं ही दामन छुड़ाना था तुमको
भला मुड़ के पीछे है तकना ही किसको
कलेजे में मेरे चुभा कर ये खंजर
स्वयं आंसुओं से नयन भर चले हो
हृदय के नगर आज खंडहर हुए हैं
अकेला मुझे किस डगर कर चले हो
-भानु शर्मा रंज
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