संयोगों के उल्लास नहीं
स्मृतियों के शूल सहे हमने
अधरों के मौन कहे हमने
जब चाँद नदी की लहरों पर चुपके से रूप बनाता है
तब याद तुम्हारी आती है मन और विकल हो जाता है
यदि तुम होते तो बात नई इन सूने घाटों पर होती
हर एक लहर पर तारों की उजली सी एक चादर होती
इस सूनी रात के पहरों में
पीड़ा के घूँट गहे हमने
जब मेघ घिरे हों अम्बर पर और प्यास धरा की जगती हो
जब बूँदें गिरती हों तरु पर और आग विरह की लगती हो
मैं कैसे सावन को गाऊँ जब प्यासा है चातक मेरा
हर दिशा खोजती है तुमको है शून्य दिशाओं का घेरा
इन पनघट की पगडंडी पर
बस एकाकीपन लहे हमने
उपवन के झड़ते पत्तों में जब आह तुम्हारी सुनता हूँ
इन खिले हुए पलाशों में मैं दाह तुम्हारी चुनता हूँ
जो फूल खिले थे वसंतों में वो आज हुए हैं अंगारे
हे मीत तुम्हारे बिन सूने लगते हैं ये नभ के तारे
इस ढलती साँझ की लाली में
अंगार विरह के दहे हमने
अधरों के मौन कहे हमने
-भानु शर्मा रंज
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