आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दक्ष मुक्तक श्रृंखला

                
                                                         
                            चमत्कार, पाखंड, ठगी जब धर्मास्था बन जाते हों।
                                                                 
                            
पहन मज़हबी चोला पशुबलि –हिंसा कर्म बताते हों।
जहाँ धार्मिक नारों से पा जाते बद्नेता सत्ता;
‘दक्ष’ वहाँ फिर शायद ही विज्ञान–तर्क बढ़ पाते हों।
-कौशल किशोर मौर्य 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर