मशालें क्रांति की अंतस लिए अविचल बढ़ें पथ पर।
फ़रेबी अफसरों, नेताओं प्रति आक्रोश है हर सर।
रहोगे ताज—ए—मसरूक पर तुम कब तलक काबिज?
‘दक्ष’ पदच्युत होने पर सलाखें ही तुम्हारा घर।
- कौशल किशोर मौर्य ‘दक्ष’
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