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मेरा आसमान कहाँ गया?

                
                                                         
                            मेरा आसमान कहाँ गया?
                                                                 
                            

तुम सजा रहे हो झांकियां अपनी,
खुशियों का उत्सव मना रहे हो,
पर ज़रा सुनो! इस शोर के सैलाब में,
तुम कितनों का जीवन निगल रहे हो।
वो जो डीजे की धमक तुम्हारी छाती को छूती है,
मेरे नन्हे से दिल को वो भीतर तक तोड़ देती है,
तुम नाचते हो जिस कानफोड़ू संगीत की थाप पर,
वही आवाज़ मेरे घोंसले से मेरे बच्चों को छीन लेती है।
मैं थक कर बैठता हूँ जब डाली पर रात को,
सोचता हूँ कि थोड़ा सुस्ता लूँ, एक पावर नैप ही ले लूँ,
पर तुम्हारा वो लाउडस्पीकर रात भर चीखता है,
मैं सहम कर जाग जाता हूँ, अपनी बंद आँख भी खोल देता हूँ।
मेरा आधा दिमाग सोता था, आधा पहरा देता था,
अब तो पूरा वजूद ही खौफ की जद में रहता है,
न भूखे पेट शिकार मिलता है, न बच्चों की चहचहाहट,
मेरा तनावग्रस्त तन-मन अब बस मौत का रास्ता तकता है।
तुम्हारी रोशनी, तुम्हारी झांकियां, तुम्हारा ये हुड़दंग,
मेरे अंडों को सुखा रहा है, मेरे डीएनए को मिटा रहा है,
कल सुबह जब तुम सोकर उठोगे उत्सव के बाद,
देखना, शहर का कोई कोना चुपचाप दम तोड़ रहा है।
ज़रा सी शांति दे दो मेरे परों को, मेरे आसमान को,
त्योहार मनाओ पर मत भूलो इस बेज़ुबान की जान को!
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
43 मिनट पहले

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