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समर्पण

                
                                                         
                            “समर्पण”
                                                                 
                            
इन आँखों का एक-एक अश्रु
सिर्फ आपके लिए बहे, मेरे प्रियतम,
अब इस जीवन की एक आप ही आस हो।
मेरे जीवन का सहारा,
इस मनोभूमि के सारथी आप ही हो।

आपको ही अपना सर्वस्व माना,
आपको ही अपना तन-मन समर्पित किया।
आपसे ही ये ज़िंदगानी है,
और आपसे ही सब नाते हैं,
हम तो आपके ही वियोग में
नीर बहाते हैं।

आपके बिन ये जग सूना,
और आप हो तो सब पूरा।

आप ही मेरे भ्राता,
आप ही मेरे स्वामी हो।
आप मेरे रोम-रोम में बसते,
आप तो अंतर्यामी हो।
मैं हूँ अगर निर्बल,
तो आप सर्वशक्तिशाली हो।
मैं हूँ यदि अपूर्ण,
तो आप सर्वगुण-संपन्न,
संपूर्ण जगत के स्वामी हो।

आपसे ही ये देह,
और आपसे ही ये श्वास, प्रभु।
आपको ही समर्पित
ये आत्मा और मेरा मन, प्रभु।
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8 घंटे पहले

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