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एक बारी आ एक गल ता दस जा

                
                                                         
                            इक गल आ के मेनू दस जा,
                                                                 
                            
कोई तां किस्सा मेनू आ के सुना जा,
की राहां वेख-वेख अख्खां उड्ड गईयां,
सौ जनमां तों इंतज़ार मेनू।

इक वारी आ के दस जा,
की अख्खां दे विच सो ग़म,
पर तू रब दी सौहं,
मेनू क्यूँ ना दस्सी?

राहां वेखदियां वेखदियां,
तेरियां इन राहां विच
खो बैठी खुद नू मैं।

इक वारी आ तां सही,
इक किस्सा मेनू सुना तां सही।
कदे तां इस ज़िंदगी विच मुड़ के वेख तां सही,
कदे तां इस बारे ख़्याल कर तां सही।

इक वारी आ...
इक गल तां दस जा..
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3 महीने पहले

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