बस इतना बताओं,
मरू या ना मरू ?
बोलू या ना बोलू ?
डरूं या ना डरूं ?
करू तो क्या करूँ ?
रुकूं तो कितना ?
हसु तो कितना ?
देखूं तो कितना ?
शरमाऊं तो कितना ?
समझाऊं तो.....
कितना ?
किस किस को ?
कोई यहां है भी समझने को ?
यहां
ठीक से किसी ने कुछ समझाया नहीं !
ना ठीक से किसी ने कुछ सुना कहीं !
इंसानियत बची है,
तो बस ये बता सखी,
मैं पियूं तो कितना ?
~कशिश भसीन
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