आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

खेला ही खेला

                
                                                         
                            वे बनाते हैं
                                                                 
                            
जातियाँ
कोई ऊँची, कोई नीची
कोई बहुत नीची, कोई सबसे नीची
फिर करते हैं प्रोत्साहित
कि बहे
सुगंधित समीर
"नीची" से "ऊँची"
और "ऊँची" से "नीची"
जातियों के बीच
करते हुये नृत्य
जैसे बलिया की
लहरिया वाली नचनिया
या बनारस की
बलखाती बाई जी ।
यह एक
बहुत राजप्रिय खेल है
जिसमें हैं
बादशाह, बेगम, गुलाम
और एक भीड़
संख्याओं की
एक से दस तक
पर आवश्यक नहीं
कि सर्वशक्तिमान हो बादशाह,
या बेगम ही
यह तो हो सकता है
कोई गुलाम भी
या हुकुम की दुग्गी भी।
हम सब हैं
उपकरण
उनके हर खेला के
हम सब हैं
पक्षविहीन
पंछी बस नाम के।
इस बार तुरुप का पत्ता
डाल कर उबाल दिया गया है
चाय की गंदी गंजी में
और फिर
हर पत्ता भी तो नहीं होता
चाय का पत्ता
फिर भी
पी तो रहे ही हैं
हम भी, तुम भी
और सरकार के सचिव भी ।

एक खेला और भी है
वे खोदते हैं
खाइयाँ
गहरी, बहुत गहरी
कुछ इस तरह
कि बन जाते हैं पर्वत
ठीक खाई के पार्श्व मेंं
इतने ऊँचे
कि हो जाते हैं वे
दुर्गम
और अलंघ्य
कोई नहीं जा सकता
इधर से उधर
और उधर से इधर,
फिर प्रारंभ होती हैं
योजनाएँ
स्वीकृत होती हैं धनराशियाँ
जिससे कि सुगम हो आवागमन
इधर से उधर
और उधर से इधर
किये बिना समतल
खाइयाँ और पर्वत
वे इसे ही कहते हैं
समानता, सामंजस्य,
लोकहितकारी योजना,
विकास...
और भी बहुत कुछ।
और हाँ!
भोजन में तेल कुछ कम कर देना
जिससे बचा सको
कुछ तेल
जलाने एक दिया
मेरे जन्मदिन पर।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर