धरती का सीना चीर रहे, ये सूरज के तीखे तीर,
तप रही हूँ मैं अंगारों सी, बरस रहा न अब नीर।
दिन-रात पसीना बहाया था मुझपर,
जैसे कोई गहरा कर्ज़ चढ़ा था तुझपर।
तब जाकर अन्न मेरे गर्भ से निकला था,
हे मनुष्य! तब तेरा जीवन पला था।
पर हे मनुष्य! तूने यह क्या किया?
अपनी ही माँ को ज़ंजीरों में जकड़ दिया!
यदि मुझको पौधों का उपहार देते,
तो मैं खुशियों का संसार देती।
मैं माँ हूँ, सब कुछ दुगुना कर देती,
तेरी झोली हरियाली से भर देती!
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