समय के जिस कालखंड ने सौंदर्य को परिभाषित किया,
कभी उसी काल-विशेष ने, उसे असुंदर बना दिया।
सुंदर और असुंदर के द्वंद्व में हम ऐसे उलझे—
कि जो मिला जन्मदाता से,
उसे भी अपनी सुंदरता के तराजू पर तौला;
कमतर लगा जब तुम्हें, तो तुम आभूषण ले आए।
आभूषण वे न थे—
तुम्हारी आँख, कान, नाक और यह निर्मल शरीर;
तुमने तो बस इन्हें अपनी परिभाषाओं से सुसज्जित कर दिया।
सौंदर्य कुछ जोड़ने या लादने में नहीं है,
अगर दृष्टि हो, तो उस शांत, निर्मल नग्नता में भी सौंदर्य है।
सौंदर्य है—"मैं" के न होने में,
"मैं" का होना ही असौंदर्य को बढ़ाता है।
असौंदर्य वह भी है, जो पर्याप्त की सीमा लांघकर
अपर्याप्त के पीछे भूखा दौड़ता है।
असौंदर्य वह भी है, जो आभूषणों और मुखौटों के पीछे
खुद को छिपाता और बचाता है।
और इस असौंदर्य को देख पाना ही,
वास्तविक सौंदर्य में प्रवेश है।
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