सूत के धागे
वक़्त की मशीन में शायद...
अब वो पुराना सूत नहीं बुना जाता,
जिसकी रेशमी डोरियाँ कभी...
मकानों को 'घर' बना कर रखती थीं!
मैं अक्सर सोचता हूँ...
अब वैसी रस्सी क्यों नहीं बनती,
जो घिस तो जाए... पर टूटे नहीं!
जो वक़्त की तीखी धूप तो झेल ले,
मगर साँसों की गिरह को ढीला न होने दे!
अजीब सा दौर है...
अब तो ज़रा हल्के हाथों से भी खींच दो,
तो सदियों का ताना-बाना...
एक झटके में टूट जाता है!
जैसे कोई कच्चा सा धागा हो,
या काँच के बर्तनों का कोई सिलसिला हो,
न कोई ठहराव, न कोई सब्र,
बस एक उधेड़बुन है जो मुसलसल चलती रहती है।
शायद... हमने रिश्तों को...
काँच की स्क्रीन्स पर समेट लिया है,
जहाँ उँगलियाँ तो मुड़ती हैं,
पर एहसासों की छुअन... कहीं खो गई है!
तभी तो... इतने कमज़ोर हो गए हैं रिश्ते,
कि ज़रा सी ग़लतफ़हमी की हवा चली,
और बरसों का साया भी साथ छोड़ गया!
सुनो...
बाज़ार से वो महँगे धागे लाना बंद करो,
रिश्तों को मज़बूत बाँधना है तो...
थोड़ा सा वक़्त, थोड़ी सी ज़मीन,
और ख़ामोशियों को सुनने का हुनर ले आओ...
शायद, वो पुरानी छुअन... फिर लौट आए!
-कपिल देव जुल्का
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