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ग़ैर-मौजूदगी का जश्न

                
                                                         
                            ग़ैर-मौजूदगी का जश्न
                                                                 
                            

मैं तुम्हारे पास कभी नहीं रहा,
फिर भी हर पल खोता रहा तुम्हें...
जैसे कोई ख़ाली मकान,
दीवारों पर टँगे कैलेंडर से गुज़रते दिनों को देखता है,
और सोचता है कि कोई तारीख़ उसकी भी होगी...
कुछ ऐसे ही, मैंने हर गुज़रते मौसम में
तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी को जिया है।
तुम तो एक मुकम्मल नज़्म की तरह,
किसी और की बयाज़ में महफ़ूज़ रहे,
और मैं... उस अधूरी सिगरेट के धुएँ की तरह,
जो होठों को छुए बिना ही हवा में बिखर गया,
तुम्हारी यादों की राख में सुलगता रहा।
अजीब सी एक मुफ़लिसी है इस दिल की,
कि जिसे कभी पाया ही नहीं,
उसे खोने का मलाल इस क़दर गहरा है...
जैसे कोई अपनी ही परछाईं को,
अंधेरे कमरे में ढूँढ़ता फिरे और न पाए।
हाथों की लकीरें आज भी वैसी ही ख़ामोश हैं,
इनमें कभी तुम्हारे नाम की कोई लकीर गुज़री ही नहीं;
पर जब भी हवा का कोई सर्द झोंका
सिरहाने से गुज़रता है,
दिल ज़िद करता है कि तुम आए थे...
और मैं फिर से तुम्हें खोने की तड़प में डूब जाता हूँ।
पास होने की ख़्वाहिश तो बहुत पुरानी है,
मगर दूर रहकर भी जो हर पल तुम्हें गँवाया है...
बस इसी एक मुक़द्दस दर्द ने,
मुझे उम्र भर ज़िंदा रखा है।
मैं तुम्हारे पास कभी नहीं रहा,
फिर भी हर पल खोता रहा तुम्हें.....

 
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53 मिनट पहले

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