मैं मचान पर हूँ,
बिलकुल सतर्क।
जो भी घटित होता है,
मेरी नज़र से ओझल नहीं।
पर इस ऊँचाई पर,
दुनिया के रुदन से एक दूरी भी है।
मैं देखता हूँ,
फिर अपनी चौकसी में लौट आता हूँ।
कैसे पहुँचा मैं इस मचान तक,
अब ठीक-ठीक याद नहीं।
शायद हर ठोकर,
एक बाँस बनती गई,
हर भय, एक गाँठ।
किसी और के लिए,
इस पर जगह नहीं ।
यह एक देह का नहीं,
एक चेतना का मचान है।
बाँस से बना है,
टूट जाने का डर ,
हर क्षण साथ चलता है।
फिर भी यही डर पूछता रहता है,
कैसे बनी रहे यह सजगता?
कैसे बची रहे भीतर का यह पहरा?
- करुणा ताडेपल्ली
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