कैसे दिखते होंगे वो पहाड़
कैसे दिखते होंगे वो पहाड़,
जिनसे मिले बरसों हो गए।
शायद आज भी वहीं खड़े होंगे,
बस... उन्हें देखने वाली आँखें बदल गई होंगी।
दुनिया की भागदौड़ में
हम इतने आगे निकल आए
कि पीछे छूट गए
अपने ही घर, अपने ही लोग,
और वे रास्ते
जो कभी हमें पहचानते थे।
याद हैं मुझे
गर्मी की हर छुट्टी,
जब गाँव जाना
सिर्फ़ सफ़र नहीं,
घर लौटना होता था।
माँ के हाथों की रोटी,
नानी के चूल्हे की आँच,
आँगन की हँसी,
और पहाड़ों की ठंडी साँसें—
सब कुछ
धीरे-धीरे
यादों में बदल गया।
पता नहीं
इस शहर ने ऐसा क्या दिया,
कि बदले में
अपनों का साथ ही ले लिया।
क्या यही ज़िंदगी है
जिसे पाने के लिए
हमने अपना पहाड़ छोड़ दिया?
अब थक जाती हूँ
इस भीड़ में चलते-चलते।
मन करता है
एक बार फिर लौट जाऊँ,
उन पहाड़ों के पास,
जो बिना कुछ कहे
हर दर्द सुन लेते थे।
पर डर लगता है...
क्या वे पहाड़
मुझे अब भी पहचानेंगे?
क्या उनकी बाँहों में
मेरे लिए आज भी जगह होगी?
या फिर...
मैं ही
अपने पहाड़ों के लिए
एक अजनबी बन चुकी हूँ।
कैसे दिखते होंगे वो पहाड़...
जिनसे मिले बरसों हो गए।
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