क्या लिखूँ?
क्या लिखूँ—ज़िंदगी की कहानी लिखूँ,
या वक़्त की बेईमानी लिखूँ।
लिखूँ उन सपनों का ज़िक्र,
जो आँखों में पलते रहे, पर पूरे न हो सके।
क्या लिखूँ—लोगों के बदलते चेहरे लिखूँ,
या रिश्तों की अनकही सच्चाई लिखूँ।
लिखूँ उन मुस्कुराहटों का राज़,
जो हर दर्द को अपने भीतर छिपा लेती हैं।
क्या लिखूँ—उम्मीद की पहली किरण लिखूँ,
या अँधेरी रातों का लंबा सफ़र।
कलम हर बार सोच में पड़ जाती है—
सच लिखूँ तो कौन समझेगा,
और चुप रहूँ तो कौन जानेगा?
आख़िर समझ नहीं आता—
दिल की आवाज़ लिखूँ,
या दुनिया के उसूल।
कहने को तो बहुत कुछ है,
फिर भी हर बार यही सवाल सामने आ खड़ा होता है—
आख़िर, क्या लिखूँ?
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